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टिकाऊ नेता की तलाश करते मतदाता  : Shivpurinews.in

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अशोक सण्ड Neelesh Singh

Fri, 14 Jan 2022 10:25 PM

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यदि मेरा भाषा ज्ञान दुरुस्त है, तो जिन शब्दों के साथ दार जुड़ा होता है, उनका अर्थ सकारात्मक ही होता है। मिसाल के लिए इज्जतदार, असरदार, शानदार, समझदार वगैरह। पता नहीं क्यों, आज विलुप्त होते ईमानदार आदमी पर ध्यान चला गया। 
एक समय था, जब राजनीति में ये बहुतायत से पाए जाते थे। जनता के प्रति जिम्मेदार। अधिक जानकारी देने और उनके नामों की सूची से टिप्पणी नाहक लंबी हो जाएगी। आज तो हालात ये हैं कि बहुत खोजने पर भी अपने वादों के प्रति ईमानदार नेता नजर नहीं आते। मिल भी जाएं, तो उनके टिकाऊ होने की कोई गारंटी नहीं। पिछले कुछ दिनों से देश के लगभग सभी अखबारों में चुनाव की आहट पर अपनी-अपनी ध्वजा फहराने और बहबूदी का ढिंढोरा पीटने के पेज सचित्र विज्ञापित हो रहे हैं। अपने काम को दमदार और सोच को ईमानदार घोषित करती तुलनात्मक झांकी! बचपन में गलियों में फेरी लगाने वाले काका के बोल रिमिक्स हो रहे- चुनाव जोर गरम, आया है बाबू मजेदार, चुनाव जोर गरम। यह मौसम टीवी देखने, अफवाहें सुनने और उनको कन्फर्म करने का है। पकी उम्र के साथ पके विचारों वाले हमारे 80 नॉटआउट ठाकुर साहब का कहना है- बेईमानी से भरी इस राजनीतिक धरा पर ईमानदार वही है, जिसे बेईमानी करने का मौका नहीं मिला। जहां हर तरफ बेईमानी के झंडे लहरा रहे हों, वहां बहार ही बहार है। देश मजबूत करने के बजाय कुरसी मजबूत करने में ऊर्जा खर्च होती है। 
भाषा भले ही समझ में आ जाए, राजनीति को समझना बहुत कठिन है और उससे भी कठिन नेताओं के मंतव्य को समझना। कभी देश मजबूत होने की बात। फिर कुछ समय विकास का दामन। देश कहां और कैसे किस मामले में मजबूत हो, उसे लेकर विचार स्पष्ट नहीं। बीच में ही कूद पड़ा कोरोना का मुद्दा। बहरहाल, जब तक चुनाव नहीं संपन्न हो जाते, शब्दों की कटारें म्यान से निकलती रहेंगी और कुछ ‘धारदार’ शब्द हवा में लहराते रहेंगे। 
    

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