रहस्यों से भरा है हमारा Sun Device, क्या आपने देखी पहले 3-d मैप की ये तस्वीर

नई दिल्ली: हमारा सौरमंडल (Solar System) बहुत ही अनोखा है. कई लोगों का मानना है कि ऐसा सौरमंडल ब्रह्माण्ड (Universe) में शायद ही कहीं हो. वहीं सूरज को सौरमंडल के संचालक का दर्जा मिला है. पृथ्वी पर होने वाले बदलावों के लिए उसे ही जिम्मेदार माना जाता है. सूर्य की परिक्रमा में पृथ्वी कर्क रेखा से मकर रेखा तक अपने अक्ष पर विचलन दिखाती है. ऐसी तमाम जानकारियों के बावजूद ब्रह्मांड में ऐसे कई रहस्य मौजूद हैं जिनके बारे में आज तक कोई नहीं जानता.

सौरमंडल का पहला 3D मैप

ये भी सच है कि विराट अंतरिक्ष की पड़ताल के लिए अभी भी कई देशों के यान सौरमंडल के चक्कर लगा रहे हैं. ऐसी ही तमाम जांच-पड़ताल के बीच हमारे सौरमंडल का पहला 3D मैप सामने आया है. कभी सोचा है कि हमारे अपने सौर मंडल के किनारे पर क्या है? तो इस रहस्य से पर्दा हटाते हुए आपको बता दें कि ये यह एक बूंद है. 

हमारे सौर मंडल का किनारा कैसा है? हमारे सिस्टम का किनारा वह जगह है जहां ब्रह्मांडीय शक्तियां टकराती हैं. इसके एक किनारे पर सौर हवा होती है जिसमें सूर्य से निकलने वाले आवेशित कण होते हैं. वहीं दूसरी ओर अंतरिक्ष की हवाएं हैं, जो आस-पास स्थित अरबों तारों से अवशोषित विकिरण से ढ़की हैं. सौर हवाएं स्पेस रेडिएशन से ग्रह की रक्षा करने का एक बड़ा काम भी करती हैं.

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लाइवसाइंस के मुताबिक सौर हवाएं हमारे सौर मंडल को एक सुरक्षात्मक परत में लपेटती हैं, जिससे 70% अंतरिक्ष विकिरण हमारे सिस्टम में प्रवेश नहीं कर पाता है. वहीं पृथ्वी की अपनी चुंबकीय ढाल यानी कवच भी हमें विकिरण से बचाने का काम करता है. इस सुरक्षात्मक परत को हेलियोस्फीयर (Heliosphere) कहा जाता है और इसके किनारे को हेलियोपॉज़ कहा जाता है. इसी जंक्शन पर एक भौतिक सीमा है जहां हमारा सौर मंडल समाप्त होता है और बाहरी स्थान शुरू होता है.

कैसे बना 3D मैप?

Astrophysical Journal में 10 जून को प्रकाशित एक नए शोध की रिपोर्ट में अपनी तरह के पहले यानी हेलियोस्फीयर के पहले 3D मैप को दिखाया गया है. इसे हासिल करने के लिए, वैज्ञानिकों ने नासा के Interstellar Boundary Explorer satellite द्वारा एकत्र डाटा का इस्तेमाल किया. इसका उपयोग करके, उन्होंने सौर हवाओं में कणों को ट्रैक किया जो सूर्य से सौर मंडल के किनारे तक पहुंच कर वापस लौटते हैं. इसके आधार पर उन्होंने ये पता लगाया की कि ये सौर हवा आखिर कितनी दूर तक जाने में सक्षम थी. इसी आधार पर शोधकर्ताओं को सौर मंडल के किनारों का नक्शा बनाने की इजाजत मिली.

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