Opinion: महल की राजनीति में आंसू बहाने क्यों मजबूर हैं सिंधिया समर्थक

MP Politics: मुख्यमंत्री के तौर पर शिवराज सिंह चौहान को पंद्रह साल पूरे होने आ रहे हैं. उनके नेतृत्व में पार्टी विभिन्न स्तर के कई चुनाव जीत चुकी है. लेकिन, 2018 के विधानसभा चुनाव में चूक जाने से सत्ता हाथ से निकल गई थी.

Source: News18 Madhya Pradesh
Last updated on: June 30, 2021, 5:47 PM IST

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भोपाल. ज्योतिरादित्य सिंधिया के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के बाद उनके समर्थकों के लिए महल की राजनीति से तालमेल बैठाना मुश्किल हो रहा है. ज्योतिरादित्य सिंधिया की बुआ यशोधरा राजे सिंधिया प्रदेश भाजपा की वरिष्ठ नेता हैं. शिवराज सिंह चौहान के मंत्रिमंडल में खेल एवं युवक कल्याण विभाग की मंत्री हैं. यशोधरा राजे सिंधिया और ज्योतिरादित्य सिंधिया महल की राजनीति के दो विपरीत धु्रव हैं. इन दोनों ध्रुवों के समर्थकों के बीच टकराव यदाकदा सामने आता है. लेकिन, मंगलवार को शिवराज सिंह चौहान मंत्रिमंडल में यशोधरा राजे सिंधिया के आक्रामक व्यवहार से ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर की आंखों में आंसू देखे गए. यह जबाबी हमला न कर पाने की बेबसी के आंसू थे?

मुखर मंत्री कही टकराव की राह तो नहीं पकड़ रहे
मुख्यमंत्री के तौर पर शिवराज सिंह चौहान को पंद्रह साल पूरे होने आ रहे हैं. उनके नेतृत्व में पार्टी विभिन्न स्तर के कई चुनाव जीत चुकी है. लेकिन, 2018 के विधानसभा चुनाव में चूक जाने से सत्ता हाथ से निकल गई थी. सत्ता में वापसी ज्योतिरादित्य सिंधिया के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के कारण संभव हो सकी. सिंधिया पिछले साल मार्च में अपने बाइस समर्थक विधायकों के साथ भाजपा में शामिल हुए थे. ज्यादातर विधायक ग्वालियर-चंबल अंचल के थे. इन विधायकों को ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक होने के नाते कांग्रेस की राजनीति में ज्यादा चुनौतियां नहीं थीं.

भाजपा में आ जाने के बाद महल की राजनीति के साथ तालमेल बैठा पाने में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. दिक्कत उन्हें भी आ रही है, जो शिवराज सिंह चौहान के मंत्रिमंडल में सदस्य हैं. चौहान मंत्रिमंडल में सिंधिया समर्थक दस मंत्री हैं. मंत्रिमंडल के सदस्यों की कुल संख्या 31 है. कैबिनेट की पिछली कुछ बैठकों में सिंधिया समर्थक मंत्रियों के विभागों के प्रस्तावों पर मंत्रियों की आपत्ति सामने आ रही है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को बीच बचाव करना पड़ता है. भारतीय जनता पार्टी की अंदरूनी राजनीति भी इस टकराव की बड़ी वजह माना जा रहे हैं.

यशोधरा ने क्यों लिया ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह को निशाने पर
प्रद्युमन सिंह तोमर की राजनीतिक निष्ठा पूरी तरह से ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ है. वे ग्वालियर से विधायक हैं. मंत्री होते हुए भी नाला साफ करने और वोटर की शिकायत आने पर खंभे पर चढ़कर बिजली सुधारने को लेकर उनकी चर्चा अधिक हो रही है. वे लगातार ट्रोल भी हो रहे हैं. मंगलवार की कैबिनेट की बैठक में खेल मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया ने ऊर्जा विभाग से संबंधित प्रेजेंटेशन में जमकर टोकाटाकी. बात इतनी बढ़ गई कि ऊर्जा मंत्री तोमर को आंखों में आंसू भरकर कहना पड़ा कि आप पूरी बात तो कह लेने दें,टोकाटाकी कर रही हैं. इस पर यशोधरा राजे सिंधिया की त्यौरी चढ़ गईं. उन्होंने कहा कि मेरी तरफ देखकर काम क्यों गिना रहे हैं, क्या धमकी दे रहे हैं. कैबिनेट में सन्नाटा पसर गया.

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रद्युम्न सिंह तोमर को शांत रहने का इशारा किया. यशोधरा राजे सिंधिया के अलावा अन्य मंत्री भी बिजली के बिलों से नाराज थे. इनमें कई ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक ही थे. यशोधरा राजे सिंधिया और तोमर के बीच की तनातनी ग्वालियर की स्थानीय राजनीति का परिणाम माना जा रहा है. यद्यपि यशोधरा राजे सिंधिया शिवपुरी से विधानसभा का चुनाव लड़ती हैं. उनका विधानसभा क्षेत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया के निर्वाचन क्षेत्र रहे गुना संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आता है. वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में सिंधिया परिवार का कोई सदस्य पहली बार चुनाव हारा था.शिवराज सिंह चौहान और ज्योतिरादित्य सिंधिया की जुगलबंदी
कैबिनेट के विवाद पर ऊर्जा मंत्री तोमर ने कहा कि किसी की कोई नाराजगी होगी तो दूर करेंगे. यद्यपि यशोधरा राजे सिंधिया के व्यवहार को लेकर वे कोई टिप्पणी करने से बचते रहे. ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में शामिल होने से पहले तक यशोधरा राजे सिंधिया पार्टी में महल का चेहरा मानी जातीं थीं. पार्टी ने यशोधरा राजे सिंधिया को वो महत्व कभी नहीं दिया,जो अभी ज्योतिरादित्य सिंधिया को मिल रहा है. ग्वालियर-चंबल अंचल में सरकार के अधिकांश महत्वपूर्ण फैसले ज्योतिरादित्य सिंधिया की सुविधा के अनुसार लिए जा रहे हैं. राजनीतिक नियुक्तियों और विकास कार्यों में भी यशोधरा राजे सिंधिया की अनदेखी हो रही है. उपेक्षा वो भाजपाई भी महसूस कर रहे हैं,जो सालों तक पार्टी के नीति निर्धारक रहे.

महल की अंदरूनी राजनीति के हिसाब से भी बुआ-भतीजे के रिश्ते भी मिलकर राजनीति करने वाले नहीं रहे हैं. यह स्थिति माधवराव सिंधिया के दौर से ही चल रही है. विजयाराजे सिंधिया भारतीय जनता पार्टी में थी और माधवराव सिंधिया कांग्रेस में चले गए थे. मां-बेटे के बीच संपत्ति का विवाद भी लंबा चला. इस विवाद की छाया बुआ-भतीजे के रिश्ते पर भी बनी हुई है. ज्योतिरादित्य सिंधिया रिश्तों को सामान्य करने की कोशिश लगातार कर रहे हैं. भाजपा में शामिल होने के बाद वे अपनी बुआ यशोधरा राजे सिंधिया से मिलने भोपाल में उनके बंगले पर भी गए. ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थकों की दिक्कत यह है कि वे सिंधिया नाम के कारण खुलकर यशोधरा राजे का विरोध भी नहीं कर पाते. जबकि यशोधरा राजे सिंधिया अपने भतीजे ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थकों का हर संभव विरोध करती हैं.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)


ब्लॉगर के बारे में

दिनेश गुप्ता

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. सामाजिक, राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखते रहते हैं. देश के तमाम बड़े संस्थानों के साथ आपका जुड़ाव रहा है.

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First published: June 30, 2021, 5:05 PM IST

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