‘तारीख पर तारीख’ के बाद अचानक करोड़पति बना मजदूर किसान, यहां पढ़ें- कैसे चमकी किस्मत?

‘तारीख पर तारीख’ के बाद अचानक करोड़पति बना मजदूर किसान, यहां पढ़ें- कैसे चमकी किस्मत?

रतलाम. तारीख पर तारीख…, तारीख पर तारीख…, तारीख पर तारीख. सनी देओल का यह फिल्मी डॉयलॉग मध्य प्रदेश के रतलाम के एक किसान पर सटीक बैठता है. इस किसान को बीते 34 वर्षों से सरकारी दफ्तरों में सिर्फ तारीख ही मिल रही थी, लेकिन 2021 में एक ऐसी तारीख भी आई, जिसे यह मेहनतकश कभी भूल नहीं पाएगा. जी हां, कहानी फिल्मी लगती है, लेकिन है बिल्कुल हकीकत. इस कहानी की शुरुआत होती है सन् 1961 से, जहां रतलाम मुख्यालय से करीब 10 किलोमीटर दूर ग्राम सांवलियारुंडी के रहने वाले आदिवासी मंगला, थावरा और नानूराम भावर के अनपढ़ गरीब पिता से 1961 में कुछ लोग ने बरगला कर ओने-पौने दामों में उनकी 16 बीघा जमीन हथिया ली थी.

16 बीघा जमीन खोने के बाद, यह आदिवासी परिवार मजदूरी करके 60 सालों से अपना गुजर-बसर जैसे-तैसे कर रहा था. इसी दौरान थावरा और उसके भाइयों ने अपनी जमीन वापस लेने के लिए बहुत कोशिश की, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. हालांकि 1987 में तत्कालीन एसडीएम ने आदेश पारित कर सन 1961 के विक्रय पत्र को शून्य घोषित कर दिया और भूमि का कब्जा इन आदिवासी भाइयों को दिए जाने का आदेश दिया. लेकिन इन आदिवासी भाइयों का नाम ना तो राजस्व रिकार्ड में दर्ज किया गया और ना ही प्रशासन ने उन्हें कब्जा दिलवाया.

बार-बार बिकी जमीन

एसडीएम के फैसले खिलाफ जिन व्यक्तियों के कब्जे में भूमि थी उनके द्वारा विभिन्न न्यायालय और फोरम पर अपील की गई और समय-समय पर जमीन बिकती चली गई. पीड़ित किसान 1987 के बाद से ही लगातार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रहा था, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. सभी स्तरों से अपने पक्ष में फैसला आने के बाद भी भूमि का कब्ज़ा नहीं मिलने पर कुछ दिनों पहले किसान थावर ने कलेक्ट्रेट पहुंचकर कलेक्टर से गुजर-बसर के लिए आर्थिक सहायता की मांग की. कलेक्टर ने जब उससे जमीन पर कब्जे की पूरी कहानी सुनी तो वे भी दंग रह गए.

कलेक्टर की पहल

कलेक्टर कुमार पुरुषोत्तम ने तत्काल एसडीएम रतलाम को एक सप्ताह में, आदिवासी के नाम उसकी भूमि के दस्तावेज तैयार करने और कब्जा दिलाने के निर्देश दिए. इसके बाद बीते 8 जुलाई को थावरा तथा उसके भाइयों के नाम से पावती एवं खसरा तैयार कर कलेक्टर ने पीड़ित परिवार को सौंप दिए.कलेक्टर रतलाम की इस संवेदनशीलता की सीएम शिवराज सिंह चौहान ने भी ट्वीट कर तारीफ की है.

बहरहाल अपनी उम्र का एक पूरा पड़ाव जमीन की जंग लड़ने वाले थावरा के लिए उसके पिता की जमीन वापस मिलना, किसी सपने से सच होने जैसा है. 16 बीघा जमीन की वर्तमान में बाजार मूल्य करोड़ों रुपयों में है. जबकि यह परिवार वर्षों से शहरों में मजदूरी कर गजर बसर कर रहा था. किसान थावर कहते हैं कि 60 साल बाद जमीन वापस मिलने से वो खुश हैं.

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