Sunday, October 17, 2021
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इस मंदिर में 1267 में बलरामपुर के महाराजा ने किए थे दर्शन, पुजारी को जमीन की थी बैनामा :shivpurinews.in

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कोरोना काल की वजह से तीन नवरात्रों में कोविड-19 के चलते आस्थावान भवानी भक्त माता वागेश्वरी के दर्शनों से वंचित रहे। इस बार मंदिर खुला तो परंपरागत रूप से भक्तों की भीड़ मंदिरों में देखने को मिल रही है। नेपाल के प्रतिष्ठित योगी नरहरि नाथ योगी ने देवभूमि भारत व आध्यात्मिक नेपाल नामक पुस्तक में विस्तार से इस मंदिर के बारे में बताया है। मंदिर निर्माण के संबंध में अनेकों जनश्रुतियां प्रचलित हैं। इसकी ऐतिहासिकता के संबंध में नेपाली साहित्यकार सनत रेग्मी बताते हैं कि सन 1267 में बलरामपुर स्टेट के महाराजा दिग्विजय सिंह मिट्टी व फूस द्वारा बनाए गए माता वागेश्वरी के दर्शन करने आये थे। उन दिनों ये क्षेत्र बलरामपुर स्टेट की जागीर था।

उन्होंने बांके जिले के करमोहना गांव में मंदिर की पूजा के लिए तत्कालीन पुजारी को जमीन बैनामा की थी। इसके प्रपत्र बांके जिले के भूलेख विभाग में मौजूद हैं। वर्तमान में करमोहना गांव के इंद्रपुर में मंदिर के संचालक चंद्रनाथ योगी व हरिहर नाथ योगी के नाम दर्ज हैं। भुवनेश्वर खनाल के हस्ताक्षर युक्त मंदिर की संपत्ति का भी एक आलेख भूलेख विभाग में मौजूद है। इसके अंतर्गत सिंह की मूर्ति, दो खंभे, भैरव, गरुड़, करवा, दीपदानी, आरतीदानी, भगवती की मूर्ति, छत्र आदि सभी चांदी के सामान मंदिर में मौजूद हैं।

वर्ष भर मंदिर में खर्च के लिए नेपाल सरकार से भी मंदिर को निश्चित रकम प्राप्त होती है। मंदिर पैगोडा शैली का बना है। परंपरागत रूप से नाथ सम्प्रदाय के पुजारी ही वंशानुगत मंदिर के पुजारी होते आये हैं। मंदिर में हनुमान, गणेश, भैरव, विश्वकर्मा, महाकाली, बगलामुखी, सरस्वती आदि देवी देवताओं की प्रतिमाएं भी मंदिर के चारों ओर स्थापित हैं। भवानी भक्त डॉ. सनत कुमार शर्मा, अर्जुन अमलानी, एडवोकेट घनश्याम दीक्षित व रामकुमार वैश्य आदि दर्जनों लोगों की अटूट आस्था माता वागेश्वरी में है।

मंदिर में पूजा विधि

रुपईडीहा। प्रतिदिन तड़के तीन बजे से 4:30 बजे तक पुजारी मुख में पट्टी बांध कर तांत्रिक व वैदिक विधि से माता का पूजन करता है। अंदर पूजा करते समय मंदिर के चारों कपाट बंद हो जाते हैं। उस समय मंदिर में प्रवेश वर्जित है। पूजा करते समय मंदिर में डंका व घंटा बजता रहता है। 3962 रुपये बांके जिले के भूलेख विभाग से मंदिर को राष्ट्र कल्याण व जन कल्याण हेतु पंचबलि को दिए जाते हैं। मंदिर में बकरा,भैसा, मुर्गा, भेड़ा व बतख की बलि दी जाती है। इसके बाद ही जनसामान्य को बलि देने की अनुमति होती है।

मंदिर की पौराणिकता के बारे में डॉ सनत कुमार शर्मा ने बताया कि दुर्गा सप्तशती के देवी कवच के 33वें श्लोक में रोम कूपेषु कौवेरी त्वचं वागेश्वरी तथा से सिद्ध है कि यहां माता सती की जीभ व अन्य अंग गिरने से वागेश्वरी नाम पड़ा। उन्होंने यह भी बताया कि बांके जिले में स्थित होने के कारण भारत व नेपाल के ग्रामीण क्षेत्रों में आस्थावान ग्रामीण इसे बांकेसुरी भी कहते हैं। उन्होंने बताया कि साक्षात देवी दर्शन मूर्ति हटा कर पुजारी कराते हैं। वर्तमान में इसके लिए रशीद भी काटी जाती है।

आज भी कायम है मंदिर में बलि प्रथा

रुपईडीहा। सोमवार को जब यह संवाददाता मंदिर पहुंचा तो देखा कि वहां पक्की ईटों से घिरा हुआ गोलाकार क्षेत्र बना हुआ है। उसी में नेपाली व मधेशी मूल के लोग मुर्गों व बकरों की बलि दे रहे थे। इसके पूर्व इन्हें रोली चंदन लगाया जा रहा था। मंदिर के सामने आदमकद खड़ेश्वर महादेव की तालाब के बीच में प्रतिमा स्थित है। इसका भी प्रथक इतिहास है। दोनों नवरात्रों में भारी भीड़ होती है।

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